White Pityriasis

कुछ अपने बारे में

आयुर्वेदिक चिकित्त्सा को ही ऐसा श्रेय प्रप्त है कि निरस जीवन को सरस बना दें ।आयुर्वेदिक चिकित्त्सा द्वरा जटिल से जटिल और ऐसी -ऐसी शरीरिक व्याधियों का सफल इलाज हो जाता है| जिन्हें आज की आधुनिक चिकित्त्सा द्वरा कठिन समझी जाति है। प्राचीन काल में आयुर्वेदिक रीति से ही सभी रोग की चिकित्त्सा की जाती थी और इसी से रोग आराम भी हो जाते थे लेकिन दुखः इस बात का हेै कि आज के स्वार्थी लोगों ने प्र्लोभन वश प्राचीन शास्त्रीय योगों में मचाही परिवर्तन कर आयुर्वेद को बदनाम कर रहैं हैं । इसके अलावे शुध्द जड़ी -बूटयों और द्रव्यों को काम में लिया जा रहा है जिससे रोग अच्छा होने के बदले बढ़ते ही जा रहे हैं । इन्हीं सब उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर हमने शुध्द आयुर्वेदिक विधि द्वार सफेद दाग की चिकित्त्सा आरम्भ कर लोगों को आयुर्वेद में श्रध्दा याऔर विश्वास उत्पन्न करने का सफल प्रयास किया है । अनुभव से यह पाया गया है कि रोग कि चिकित्त्सा आयुर्वेद के व्दारा जितनी सफलता से की जा सकती है उतनी अन्य चिकित्त्सा प्रणाली व्दारा नही । आधुनिक चिकित्त्सको ने भी इस बात को स्वीकार किया है। हम रोगियों को सलाह देते हैं कि किस प्रकार की चिकित्त्सा से उनका रोग दूर होगा और उन्हें कैसी दवा करनी चाहिए।

रोग परिचय

यह रोग सफेद दाग, शिवत्र, श्वेत कुष्ठष, फुलबहरी,वर्स ल्युकोडर्मा ( ) इत्यादि अनेक नामों से भिन्न-भिन्न भाषाओं मे जाना जाता है । इस रोग मे शरीर की त्वचा पर सफेद ,गुलाबी अथवा लाल रंग के दाग पड़ जाते हैं । पहले छोटा-छोटा चिन्ह दिखाई देता हैं। जब रोग काफी बढ़ जाता है तब धब्बे इतने उभरे हुए स्थान बना लेते हैं की त्वचा का स्वभाविक रंग भी लुप्त हो जाता है । अन्त में दाग पर के बाल भी सफेद हो जाते हैं। शरीर के किसी भी अंत पर किसी भी आयु में यह सफेद दाग हो सकता है । इस रोग मे जिस स्थान पर दाग होता है प्रायः वहॉं पर किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती है । किसी -किसी को थोड़ी बहुत जलन या खुजली रहती है । यदि दाग मुॅंह पर हो जाये तो बहुत बुरे लगते हैं । इस रोग मे लोग अपने साथ बैठाना व खाने पीने मे भी हिचकते हैं कि कहि ऐसा न हो कि यह रोग मुझे भी हो जाये । वैसे लोगो को मै सलाह देता हूॅं कि यह कोई छूत का रोग नही कि साथ बैठने-उठने से दुसरे को हो जाये । रोगी के साथ इस तरह की उपेक्षा हरगिज न करे इस रोग के कारण लड़के-लड़कियों की विवाह में काफी दिक्कत होती है। सफ़ेद दग के करण स्त्री-पुरूष अत्यंत कुरुप दीखते हैं । समज में उनका सम्मान कम होता है और लिग उनको उपेक्षा से देखते है। रुपवान लड़के-लड़कियों और युवा स्त्री पुरूषों के शारीरिक सौंदर्य की शोभा नष्ट होती है। प्रौढ़ स्त्री पुरूषों का जीवन कष्टमय मे बीतता है। इस रोग के चिकित्त्सा में लोगों को काफी रुपये खर्च हो जाता है परन्तु उनकी इच्छानुसार और स्थाई लाभ न होने के कारण् वे बिल्कुल निराश हो जाते हैं लेकिन आयुर्वेद में इसका सफल इलाज है जिससे रोग मिट जाता है । हमारे देश में यह अधिक है। आयुर्वेद के सभी विव्दानों ने त्वचा, रक्त, मांस आदि सप्तधातुओ और त्रिदोष से सम्बन्ध रखकर उत्पति वाले कुष्ट कुल अठारह प्रकार के माने है । सफेद दाग को इनमें परिगणित नहीं किया गया है । किन्तु त्वक रोग सामान्य होने से इसे त्वक् विकारों के ही अन्तर्गत मानकर इसका पृथक से वर्णन किया गया । त्वक् रोग सामान्य होते हुए भी यह अपने स्वरुप, निदान, सम्प्रति दोष दूष्य-संग्रह आदि की दृष्टि से अपना सबसे अलग एक विशेष स्थान रखता है ।

त्वचा के सात भेद-

आचार्य सुश्रुत के अनुसार त्वचा निम्नलिखित सात प्र्कार के होते हैं-(१) अवभासिनी (२) लोहित (३) श्वेत (४) ताम्रा (५) वेदिनी (६) रोहिणी (७) मॉंसधारा । यहॉं पर सिर्फ प्रथम चार त्वचाओं का ही वर्णन किया जा रहा है । (१) अवभासिनी- यह शारीर के उपर की त्वचा है, इसके द्वारा शारीर का रंग दिखाई पड़ता है । इसी से सेहुआ होता है। (२) लोहित -अवभासिनी त्वचा के नीचे वाली यह दूसरी त्वचा है।इसे क्षुद्र रोग पैदा होते हैं। (३) श्वेत-यह लोहिता या ताम्रा के बीच की पर्त है। (४) ताम्रा – यह त्वचा की चौथी पर्त है और इसी से सफेद दाग होता है। इसी के रंगे ग्राहण कोशिकायें या सेले होती है। जब इन कोशिकायों में रंग ग्रहण करने की शक्ति का अभाव हो जाता है,शारीर में जिन स्थानों पर ये कोशिकायें रंग ग्राहण नहीं करती हैं वहीं सफेद दाग हो जाता है।

रोग उत्पति होने के कारण

यह रोग होने के कितने कारण है । यह आवश्यक नहीं कि हर रोगी का एक कारण हो। शिवत्र रोग (सफेद दाग) का प्रधान कारण क्या है, निशिचत रुप से नहीं कहा जा सकता है। इस रोग के कारणों के सम्बन्ध में आयुर्वेद का एक कारण अधिक न्यायसंगत प्रतीत होता है कि विरुध्द आहार-विहार आदि के कारण शारीर को धारण करने वाले बात, पित्त और कफ विकृत हो जाते हैं, जिनके परिणाम स्वरुप इनमें विकार आने से सफेद दाग की उत्पति होती है। अतः यह दोणज व्याधि है। कुछ पदार्थ ऐसे हैं जो अकेले- अकेले खाने से कोइ हानी नहीं करते लेकिन एक साथ खाने से आपस में मिलकर विष तुल्य हो जाते हैं,खट्टे फल, नमक से बने पदार्थ, मॉंस मछली, शराब, मूली इन सब पदार्थों के साथ दूध पीने से भी इस रोग की उत्पत्ति हो सकती है। प्राकृतिक वेगों को रोकने से वमन, मल-मूत्र आदि रोकने से भी इस रोग की उत्पत्ति हो सकती है । गलत मैथुन- खुब भर पेट भोजन कर तथा अधिक शराब पीकर मैथुन करने से मैथुन के तुरन्त बाद शीतल जल पीने से रजस्वला नारी बूढ़िया , अनिच्छा वाली नारी या यौन रोग से पीड़ित नारी तथा पशु आदि के साथ मैथुन करने के कारण भी यह रोग हो जाता है। इसके अतिरिक्त पुरानी अॉंव या पेचिश( ) चेचक ( ) तथा अतड़ियों की खराबी औरपेट में लगातार क्ब्ज रहने के कारण पेट में कृमि आदि हो से भी यह रोग उत्पन्न हो सकता हैं कभी किसी अन्य तेज वा के कुप्रभाव से भी सफेद दाग होते हैं। खाध सामग्री में मिलावट -आजकल तेल,धी दूध,आटा, चावल, मसाले अदि में मिलावट के कारण अमाशय में जाकर अॉंतों में खराबी पैदा करती है । जिससे यकृत भी खराब हो जाती है। यकृत खराब होने से पित भी खराब हिने लगता है और फिर सफेद दाग हो सकते हैं। आयुर्वेद शासत्र के विद्वानों एवं महर्षियों के मतानुसार यह रोग प्रायः वंश परम्परागत(Heridetary) भी होता है।
शिवत्र रोग के भेद- आचार्य चरक ने श्वेत दाग का उल्लेख तीन नामों से किया है–वारुण, दारुण और शिवत्र। आचार्य सुश्रुत ने इसे शिवत्र और किलास नामों से व्यक्त किया है।

आचार्य चरक के अनुसार इसके दो भेद है

आयुर्वेदिक चिकित्त्सा को ही ऐसा श्रेय प्रप्त है कि निरस जीवन को सरस बना दें ।आयुर्वेदिक चिकित्त्सा द्वरा जटिल से जटिल और ऐसी -ऐसी शरीरिक व्याधियों का सफल इलाज हो जाता है| जिन्हें आज की आधुनिक चिकित्त्सा द्वरा कठिन समझी जाति है। प्राचीन काल में आयुर्वेदिक रीति से ही सभी रोग की चिकित्त्सा की जाती थी और इसी से रोग आराम भी हो जाते थे लेकिन दुखः इस बात का हेै कि आज के स्वार्थी लोगों ने प्र्लोभन वश प्राचीन शास्त्रीय योगों में मचाही परिवर्तन कर आयुर्वेद को बदनाम कर रहैं हैं । इसके अलावे शुध्द जड़ी -बूटयों और द्रव्यों को काम में लिया जा रहा है जिससे रोग अच्छा होने के बदले बढ़ते ही जा रहे हैं । इन्हीं सब उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर हमने शुध्द आयुर्वेदिक विधि द्वार सफेद दाग की चिकित्त्सा आरम्भ कर लोगों को आयुर्वेद में श्रध्दा याऔर विश्वास उत्पन्न करने का सफल प्रयास किया है । अनुभव से यह पाया गया है कि रोग कि चिकित्त्सा आयुर्वेद के व्दारा जितनी सफलता से की जा सकती है उतनी अन्य चिकित्त्सा प्रणाली व्दारा नही । आधुनिक चिकित्त्सको ने भी इस बात को स्वीकार किया है। हम रोगियों को सलाह देते हैं कि किस प्रकार की चिकित्त्सा से उनका रोग दूर होगा और उन्हें कैसी दवा करनी चाहिए।

रोग परिचय

किलास और अरुण श्वेत दाग जब रक्त के आश्रय से होता है तो शिवत्र और जब मॉंस आश्रय से होता है तो किलास कहलाता है। दोष भेस से लक्षण भेद चरक के मतानुसार बात से पैसा हुआ शिवत्र कुछ लाल होता है और मॉंस में रहता है। कफ से पैदा हुआ शिवत्र सफेद होता है और भेद में रहता है। वात जनित शिवत्र से पित्त जनित और पित्त जनित से कफजनित शिवत्र कठीन होता है।page no. (6) रोग के कारणों के सम्बन्ध में आधुनिक कथन यह है कि यकृत ( ) की खराबी ही मूल कारण है । उसके अनुसार त्वचा में मिलेनिन( ) की मात्रा कम हो जाती है तो वहॉं कि त्वचा का रंग सफेद हो जाता है। आधुनिक मतानुसार त्वचा में यह पदार्थ होता है ।यह पदार्थ त्वचा की वर्ण व्यवस्था बनाये रखता है। जब किसी कारणवश यह पदार्थ कम हो जाता है तो वहॉं की त्वचा का रंग बदलने लगता है। त्वचा का रंग मिलेनिन पर निर्भर करता है। इस प्रकार त्वचा का वर्ण स्थिर में जहॉं प्रोटिन आवश्यकता है।वहॉं ताम्रा की आवश्यकता है।

रोगियों के लिए आवश्यक निर्देश

(1) सुबह सबेरे उठकर प्रतिदिन भ्रमन करें। यदि हो सके तो कुछ व्यायाम भी करें (2) भोजन हल्का व सुपाच्य अर्थात जो शीघ्र पच सके वैसा ही करें। (3) सोने से दो या तीन घण्टे पूर्व भोजन कर लेना चाहीए। जिससे भोजन अच्छी तरह पच सके। (4) किसी भी हालत में पेट की गड़बड़ी न रहने दें क्योंकि इससे रोग बढ़ने में काफी सहायता मिलती है। कहने का अभिप्राय यह है कि पेट सम्वन्धी कोई गड़बड़ी जैसे कब्ज पेचिस कृमि आदि हो तो इस प्र तुरन्त ध्यान देना चाहिए। (5) (शराब आदि नशे की बुरी लत हो तो इसे त्याग दें। (6)मॉंस मछली,अण्डा, इत्यादि खाना बिल्कुल बंस कर दें। (7) छोटे बच्चों को सफेद दाग हो गया हो तो उनके पेट पर ध्यान अवश्य देना चाहिए कि पैखाना कैसा होता है, पाचन क्रिया ठीक कर रहा है या नहीं ? (8) जिसके परिवार में सफेद दाग है आगे वाली पीढ़ी को इससे बचाव के लिए बच्चों को खट्टा फल ( विटामीन च का प्रयोग) का सेवन जहॉं तक हो सके करना चाहिए। (9) दागों पर दवा लगाने के बाद सूर्य की रोशनि दिखाना भी लाभकारी है।

रोग जटिल होने के कारण

जब मनुष्य आरम्भ काल में ही सफेद दाग जैसे भंयकर रोग से ग्रसित होकर स ही जॉंच एवं निदान करा कर उचित ढ़ग से आवश्यक इलाज करता है तो वह शीघ्र ही कुछ दिनों में अपने रोग से सदा के लिए मुक्ति पा लेता है अन्यथा उनके रोग जटिल हो जाते हैं और उन्हें जड़ से आराम होने में चार-पॉंच आठ या दस माह लग सकते हैं। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि गलत औषधि दागों पर लगाने से उस स्थान का चमड़ा मोटा हो जाता है और तब वह जटिल बन जाता है। ऐसे दागों को जड़ से मिटाने में एवं प्राकृतिक रंग लाने में कुछ अधिक समय लग जाते हैं।इसके अलावे कुछ दाग ऐसे स्थानों के भी होते हैं। ( तलवा, तलहथ, ओठ, स्त्री-पुरुष का जनेन्द्रिय आदि) जिसकी अवधि तीन साल से भी अधिक हो तो उन्हें आराम होने में दो तीन साल तक भी लग जाते हैं या इससे अधिक भी।

चिकित्त्सा में ध्यान देने योग्य बातें

रोग चाहे किसी भी प्रकार का हो उसकी चिकित्त्सा करते समय सर्व प्रथम रोग होने के कारणों को रोकना अनिवार्य है ताकि रोग सदा के लिए निर्मुल हो सके। सफे दाग, शरीर के अन्दर की भिन्न-भिन्न खराबियों के कारण शरीर पर उत्पन्न होते हैं।अतः इसकी चिकित्त्सा में धैर्य और साहस कि जरुरत पड़ती है। रोग कितना पुराना है, कितना फैला हुआ है और किन-किन स्थानों पर है ? इन सब बातोम पर भी लाभ का समय निर्भर करता है ।अगर दाग ज्यादा फैला हुआ हो ज्यादा समय का हो तो रोग आराम होने में ज्यादा समय लग सकता है परन्तु बहुत से रोगी प्रायः एक या दो माह ही इलाज कर छोड़ देते हैं जो उनकी एक बड़ी भूल है। यह कोई ज्वर नहीम कि खाई और बुखार साफ।इसमेम त्वचा का रंग बदलने में कुछ समय अवश्य लग जाते हैं।चुँकि ह र रोगी को एक ही तरह के इलाज किया जाता है।पूरे चेहरे व शरीर के अन्य स्थानों के सभी दाग मिट जाने पर भी कुछ माह तक इलाज चालु रखें जिससे कि रक्त के सभी दोष दूर हो जायें अन्यथा दाग दुबारा हो जाने का भय रहता है।

अपथ्य

विशेषकर खट्टे पदार्थ चाहे कोई भी खट्टे फल हों परहेज आवश्यक है। मॉंस मछली,अण्डा,उड़द दाल, मूली,खटाई, प्याज, लहसुन, अधिक मिर्च मसाले, दही इत्यादि का सेवन न करें जहॉं तक हो सके नमक का प्रयोग कम करें।

पथ्य

रोगी को हरे शाक का प्रयोग करना चाहिए। भोजन में सब्जी के लिए परबल, पालक, भिंडी आदि उपयोगी है। रोगी शीघ्र पचने वाले आहार का सेवन करें। दालों में चना, मुँग एवं अरहर की दाल श्रेष्ट है। चना का प्रयोग अधिक से अधिक करें। मीठे फल भी खाये जा सकते हैं।

सिर्फ बाह्य चिकित्त्सा ही पर्याप्त नहीं

शरीर पर सफेद दाग का होना ऐसा रोग है जिसे मिटाने के लिए बाह्य चिकित्त्सा ही नहीं है। एस रोग के लिए जो बाजारु लेप आदि है उनके लगाने से कभि-कभि दागों का रंग बदलता हुआ दीख पड़ता है लेकिन इससे स्थायी लाभ नहीं होता और कुछ समय बाद दाग ज्यों का त्यों हो जाता है या शरीर के किसी अन्य स्थान पर निकल जाता है। इस चिकित्त्सा से रक्तगत दोष दूर नहीं होता ।कभि-कभि ऐसा भी देखा गया है कि बाह्य चिकित्त्सा से दाग पर फोला या छाले हो जाते हैं। जिससे आराम होने पर दाग सफेद का सफेद ही रह जाता हैं। अतः जब तक चिकित्त्सा द्वारा अन्दर के समस्त विकरों को दूर नहीं किया जाता है। तब तक इस रोग को मिटाना सम्भव नहीं हैं। यही कारण है कि इसके मूल से नष्ट होने में कुछ अधिक समय लग जाते हैं।

सफेद दाग नाशक परीक्षित योग

प्राचिन समय के आयुर्वेदिक विद्वानों एवं ऋषि-मुनियों ने बड़े-बड़े ग्रंथों में सफेद दाग को जड़ से हमेशा के लिए मिटाने के लिए उत्तम योग दिये हैं जिसके मुकाबला जगत की कोई भी बड़ी से बड़ी चिकित्त्सा एवं औषधि नहीं कर सकती ।यह मेरा दृढ़ विशवास एवं विशेष अनुभव है कि सफेद दाग चाहे वे कितने ही पुराने शंख के समान सफेद क्यों न हो, दाग के रोएँ उजले हो गयेहो तथा चमड़ी मोटी हो गई हो तो वे भी इन योगों के मिट ही जाते हैं।ये सभी योग ग्रन्थों में वर्णित हैं किन्तु ध्यान देकर लोग वे इनका विधिवत प्रयोग नहीं करने और आलसियों के भॉंति कह देते हैं कि इस रोग का कोई इलाज नहीं है । में इस बात से कदापि सहमत नहीं हूँ क्योंकि मैंने इन योगों को ऐसे अनेक रोगियों पर प्रयोग करके देखा है और महान सफलता पाई हैं।

लाभ कैसे अनुभव होता है?

चुँकि यह रोग कुष्ट की भांति ही है।इसलिए इसके जड़ से मिटाने में कुछ समय अवश्य लगता है। फिर भी इनका मिटना रोग के नये पुराने होने पर निर्भर करता है। कुछ हीं दिनों के दवा सेवन पर लाभ प्रतीत होने लगता है। परन्तु इसे पुर्ण रुप से नष्ट होने में तीन-चार, सात-आठ या एक वर्ष लग सकते हैं। जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं कि इलाज शुरु हो पर यदि कुछ परिवर्तन दाग पर शिध्र नजर आने लगे तो उसे मिटाना आसान समझना चाहिए। इस तरह दाग शिध्र मिट जाते हैं। परन्तु जिस दाग पर दवा का असर देर से हो उसे मिटने कुछ अधिक समय अवश्य लगता है। जब दवा का असर शुरु होता है तो दाग किनारे से छोटा होना शुरु हो जाता है। कभी यह पहले ताँम्बे के रंग का होता कभी स्याह पड़ जाता है तथा कभी -कभी दाग पर छोटे-छोटे शरीर के छींटे पड़ने लगते हैं।और अन्त में वे छोटे-बड़े होकर दाग को ढ़ँक लेते हैं कभी एैसा भी देखा गया है कि दाग पर छाले उठ जाते हैं। और कुछ चुन-चुनाहट होने लगति है । छाले होने पर रोगी को घबराना नहीं चाहीए। यह रोग अच्छा होने का लक्षण है।

रोगियों के लिए आवश्यक बातें।

(1) याद रखिये हमारे यहाँ रोगियों के इलाज पर काफी ध्यान दिया जाता है जिससे प्रत्येक रोगी को लाभ होता ही है इसलिए यहाँ का यही नाम विशवसनीय है। गलत जगह एवं अनुभवहीन चिकित्त्सक से चिकित्त्सा करवाकर समय और पैसा बर्बाद न करें। अन्यथा जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा रोग और जटिल होता जायेगा । (2) इस पुस्तक को ध्यान पुर्वक अध्ययन करें तथा इसके साथ भेजे गये रोग जाँच फार्म सही-सही भरकर हमारे पास रोग की पुर्व जानकारी के लिए भेजें। रोग के बारे में स्पष्ट लिखें कुछ भी छिपाये नहीं।रोग का इलाज व पता गुप्त रखा जाता है। (3) पत्र हमेशा रजिस्ट्री से ही भेंजें जिससे कि आपका पत्र सुरक्षित एवं समय पर मिल जाय। रजिस्ट्री खर्च आपको बाद कर दिया जायेगा । (4)56 और 99 A.P.O. में V.P पार्सल भेजने का नियम नहीं हैं।इसलिए फौजी भाईयों को चाहिए कि इलाज का कीमत मनीरडरड ( M.O. ) द्वारा भेज दें ताकि उनके लिए दवाईयाँ रजिस्ट्री पार्सल से भेज दी जाय। (5) पत्र व्यवहार करने वाले रोगियों को भी वैसा ही इलाज किया जाता है जैसा कि हमारे यहाँ स्वयं आकर इलाज कराने वाले रोगियों की। (6) रोगियों को शर्म व संकोचवश रोग आरम्भ में ही चिकित्त्सा करवाने में आलस्य नहीं करना चाहिए अथवा सस्ते इलाजों के चक्कर में न पड़ना चाहिए । इससे रोग जटिल हो सकते हैं। (7) यदि किसी रोगी को यह पुस्तक नहीं मिली हो तो वे रोग जाँच-फार्म में दिये गये प्रशनों का उत्तर लिखकर भेज दें।उत्तर प्राप्त होते ही आपको उचित चिकित्त्सा और परामर्श दिया जायेगा। (8) रोग का पत्र आने पर उनका नाम रोगि रजिस्टर पर चढ़ाया जाता है अतः रोगि को चाहिए कि पत्र व्यवहार करते समय रोगी संख्या (Ref No.) अवश्य लिखा करें ताकि पिछला रेकर्ड देखा जा सके। (9) इस पुस्तक में जो रोग जाँच-फार्म दिया हुआ है उसे फाड़कर न भेजें। एक अलग कागज पर सभी प्रश्नों का उत्तर भेजें।